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कोविड के बाद बढ़ती बेरोज़गारी बन सकती है मोदी का वॉटरलू! 

कौन सी अर्थव्यवस्था है जिसमें उसकी तो नौकरी चली जाती है, लेकिन उसके उत्पादन, विपणन और प्रबंधन में न रहने के बावजूद अंबानी कहाँ से हर घंटे 90 करोड़ कमा लेते हैं? क्या ईंटा-गारा ढोना या शारीरिक श्रम करना मेरिट में नहीं आता?
एन.के. सिंह

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि नेपोलियन बोनापार्ट वॉटरलू का युद्ध न हारा होता यदि 18 जून, 1815 को उसका पेट खराब न हुआ होता। उसे रात से ही दस्त होने लगे जिससे सेना ने उस दिन देर से कूच किया और दोपहर तक मार्शल ब्लुचर अपनी टुकड़ी के साथ वेलिंग्टन की सेना से मिल कर युद्ध में भारी पड़ गया।

मोदी को 'डिसलाइक'?

कोरोना के बहुआयामी संघात में बेरोजी हुए करोड़ों और इसी बीच एक वर्ग की बढ़ती पूँजी ने समाज में असमानता उस मुकाम पर पहुँचा दी है, जहाँ सामान्य जन को अपने से जुगुप्सा होने लगी है। मोदी को लोकप्रिय बनाने वाला वर्ग इस जुगुप्सा-जनित क्रोध में अपने ही नेता को ‘डिसलाइक’ करने लगा है।  
कोरोना कहर में लॉकडाउन के दौरान संगठित क्षेत्र में पक्की नौकरी वाले दो करोड़ लोग (जिनका पीएफ़ भी कटता था) और असंगठित क्षेत्र में 10 करोड़ दुकानदार, रेहड़ी पटरी-ठेला वाले और दिहाड़ी करने वाले यानी प्रवासी मज़दूर बेरोज़गार हो गए।

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कोरोना से असमानता बढ़ी

लेकिन इसी दौरान देश के सबसे धनी व्यक्ति मुकेश अंबानी की पूँजी हर घंटे 90 करोड़ रुपये की रफ़्तार से बढ़ती रही। संविधान की प्रस्तावना में ही भारत के लोगों के लिए ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समानता’ देने का वादा है। यानी जिनकी नौकरियाँ गयीं वे अंबानी की तरह सक्षम नहीं थे और ‘समान अवसर’ का लाभ उठाने में फिर चूक गए।
जहाँ साल 2000 में देश के एक फ़ीसदी संपन्न वर्ग के पास देश की 37 प्रतिशत पूँजी थी, 2005 में बढ़ कर 42 फ़ीसदी, 2010 में 48 फ़ीसदी, 2014 में 58 फ़ीसदी और अब 62 फ़ीसदी हो गयी है।
 इसका मतलब बचे 99 फ़ीसदी लोग ‘समान अवसर’ मिलने के बावजूद लगातार पिछड़ते जा रहे हैं! 

अवसर की समानता?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि भारत में यह असमानता आने वाले दिनों में और बढ़ेगी। पूरी दुनिया में इकोनॉमिक मॉडल ही ऐसा है जो आभास तो ‘अवसर की समानता’ का देता है, लेकिन पूँजी अंबानी की बढ़ती है और प्रेमचंद की होरी, झुनिया और गोबर ग़रीब होते जाते हैं।     

लेकिन इस बार भी जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्र के नाम सन्देश दे रहे थे, उनके मीडिया प्रबंधकों के लिए मुश्किल घड़ी थी। डेढ़ माह में पहले पीएम के ‘मन की बात’ के दौरान भी 10 लाख लोगों ने ‘डिसलाइक’ दर्ज कराया था।
उसे यह कह कर ख़ारिज किया गया जो युवा संघ लोक सेवा की परीक्षा और अन्य परीक्षाओं को टालने की माँग कर रहे थे, यह उनका फ़ौरी गुस्सा था।

क्या होती है मेरिट?

दूसरी बार ‘डिसलाइक’ की संख्या बढ़ने लगी तो इसकी हकीक़त का विश्लेषण गहराई से करने की जगह ‘खैरख्वाहों’ ने ‘डिसलाइक’ का बटन हटा कर केवल ‘लाइक’ कर दिया। शुतुरमुर्ग भी ऐसे ही रेत में सिर घुसा कर मान लेता है कि नहीं दीख रहा तो शिकारी चला गया।
इस नए लोक आचरण को राजनीति शास्त्र के अलावा अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के संश्लेषित चश्मे से समझना होगा। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और दार्शनिक माइकेल सेंडल ने अपनी  बहुचर्चित किताब ‘दी टाइरेनी ऑफ़ मेरिट-वॉट्स बिकम ऑफ़ कॉमन गुड’ (योग्यता का आतंक -क्या हुआ लोक कल्याण का) में एक नयी लेकिन बेहद प्रभावशाली अवधारणा विकसित की है।

सामूहिक असफलता

इसके तहत ‘योग्यता का अहंकार (ह्यूब्रिस ऑफ़ मेरिट)’ जब एक मुकाम से आगे बढ़ता है तो जीवन में कम ‘सफल’ यानी असफल रहे लोगों में एक सामूहिक गुस्सा पैदा होता है।

यह अहंकार बार-बार अपनी उपलब्धियों को दिखाते हुए यह साबित करने की कोशिश करता है कि जिनको नहीं मिली वे ‘नालायक थे’। इसके साथ ही बढ़ती असमानता उस बड़े असफल वर्ग पर जले पर नमक का काम करती है। क्या जो सफल रहे वे वाकई मेरिट वाले थे और फिर यह मेरिट होती क्या है?

आईवी लीग में मेरिट?

उदाहरण के रूप में लेखक ने दिखाया कि दुनिया में सम्मानित ‘आईवी लीग’ के आठ में दो -हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, के दो-तिहाई छात्र सबसे ऊपर के आय वाले 20 प्रतिशत परिवारों से आते हैं जबकि तमाम वित्तीय मदद की नीति के बावजूद लीग के कॉलेजों  में निम्न आय वर्ग के 4 प्रतिशत से भी कम बच्चे पढ़ते हैं। 

निम्न वर्ग की बढ़ती नाराजगी ही थी कि 2016 के अमरीकी चुनाव में ट्रम्प को दो-तिहाई वोट उस वर्ग के मिले जिनके पास कोई कॉलेज डिग्री नहीं थी, जबकि हिलेरी क्लिंटन को अधिकांश वोट ग्रेजुएट और उच्च शिक्षा वालों के मिले।

मोदी की लोकप्रियता

भारत में भी मोदी को 2014 में जो लोकप्रियता मिली थी वह 2000 से बढ़ती ग़रीब-अमीर की खाई और 2010 के बाद भ्रष्टाचार को लेकर मुखर होती जन चेतना और ठीक उसके बरअक्स तमाम घोटाले के बीच कांग्रेस मंत्रिमंडल में शशि थरूर, कपिल सिब्बल टाइप अभिजात्य वर्गीय चरित्र वाले नेताओं का ब्रिटिश उच्चारण के साथ अंग्रेज़ी में ‘मेरिट’ दिखाते हुए सरकार का बचाव करना लगातार विपन्न होती जनता को रस नहीं आया और उसने एक ‘चाय बेचने’ का दावा करने वाले को चुन लिया। 
लेकिन कोरोना से बचने के लिये लगे लॉकडाउन के बाद बेरोज़गारी झेल रहे एक बड़े वर्ग को समझ में नहीं आया कि खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर, खरबूजा ही क्यों कटता है।
कौन सी अर्थव्यवस्था है जिसमें उसकी तो नौकरी चली जाती है, लेकिन उसके उत्पादन, विपणन और प्रबंधन में न रहने के बावजूद अंबानी कहाँ से हर घंटे 90 करोड़ कमा लेते हैं?

मेरिट?

क्या ईंटा-गारा ढोना या शारीरिक श्रम करना मेरिट में नहीं आता? एक कंप्यूटर इंजीनियर, जिसकी नौकरी एक झटके में लॉकडाउन के बाद चली गयी, अंबानी के बेटे से ज्ञान की किस विधा में कम था? अगर नहीं तो मेरिट कहते किसे हैं ?    

विश्व भूख सूचकांक ने भारत में कुपोषण-जनित बाल मृत्यु की हकीक़त बताई। हम बांग्लादेश, पाकिस्तान और म्यांमार से भी पीछे हैं। हम 2018 के मुक़ाबले 2019 में अन्य देशों के मुक़ाबले और नीचे खिसक गए हैं।

हंगर इनडेक्स

लेकिन हमारी चिंता भूतकाल या वर्तमान को लेकर नहीं, भविष्य को लेकर होनी चाहिए। विश्व मुद्रा कोष ने विकास के पूर्वानुमान (-4.4 प्रतिशत) को और नीचे करते हुए अपने आंकड़ों में देश के भावी जीडीपी विकास दर में गिरावट ग्राफ़ के ज़रिये दिखाते हुए अब -10.10 कर दिया है। 

दुनिया के तमाम मुल्कों जिनमें अमरीका के अलावा चीन, ब्राज़ील और जापान भी हैं, के मुक़ाबले भारत का औद्योगिक उत्पादन अल्प काल में ही नहीं बल्कि मध्यम काल (जो सरकार के कार्यकाल के साथ ख़त्म होता है) के लिए भी काफी कम रहेगा। मुद्रा कोष की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान तक पर भी कोरोना का दुष्प्रभाव कम रहेगा।

आईएमएफ़ रिपोर्ट

जो तथ्य सबसे ज्यादा चिंता पैदा करते हैं वे यह कि पहली बार बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भारत से बढ़ गयी है। यह देश एक युद्ध के तहत भारत से 20 साल बाद स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया और अनेक बार फ़ौजी हुक़ूमत के डरावने साये में रहा। पाकिस्तान से अलग हो कर इस देश ने पिछले 15 सालों में अद्भुत ढंग से तरक्की की और आज चीन और अमरीका भी इसके विकास पर नजर जमाये हैं।

इसके ठीक विपरीत मुद्रा कोष के अनुमान के अनुसार, कोरोना-उत्तर वैश्विक परिदृश्य में ग़रीब और ग़रीब होगा यानी असमानता बढ़ेगी, क्योंकि करीब 9 करोड़ अतिरिक्त लोग ग़रीबी रेखा के नीचे आ जायेंगे।

कोविड-उत्तर भारत

भारत में यह स्थिति और गंभीर होगी क्योंकि यहाँ पहले से भी असमानता रही है। यूनिसेफ़ के अनुमान के अनुसार, दुनिया में क़रीब 160 करोड़ बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ा है और साथ ही चूंकि भारत सहित कई मुल्क शिक्षा के साथ मुफ्त भोजन भी देते थे (जो फिलहाल अस्त-व्यस्त है) लिहाज़ा कुपोषण भी बढेगा।
ध्यान रहे कि स्कूल शिक्षा कम होने का मतलब ताउम्र कम आय में जीना होता है, लिहाज़ा शाश्वत ग़रीबी की गर्त से उनका निकलना मुश्किल होगा। वर्तमान भारत सरकार को बढ़ती ग़रीबी, असमानता और कम होती मानव पूँजी से जूझना होगा। रास्ता दुर्गम है, पर गंतव्य तक पहुंचना असंभव नहीं।   
ऐसे में मोदी के प्रति बढ़ता गुस्सा और कम होती ‘लोकप्रियता’ एक संकेत है कि आर्थिक मॉडल बदलें ताकि किसान के बेटे की मेरिट और अंबानी के बेटे की मेरिट असली ‘अवसर की समानता’ दे कर देखी जाये न कि स्टॉक मार्केट के आचरण के हिसाब से।
मेरिट के  अहंकार की प्रतिक्रिया में बेरोज़गार हुए युवाओं और निराश हुए मध्यम व निम्न वर्ग का गुस्सा उन्हें मोदी से दूर करने लगा है।    

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