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राजभर की राहें अलग, यूपी में बीजेपी के ख़िलाफ़ उतारे प्रत्याशी

लंबी जद्दोजहद के बाद आख़िरकार उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सहयोगी रहे ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने अपनी राहें अलग कर ली हैं। बीते काफ़ी समय से ओमप्रकाश राजभर अपने बयानों से बीजेपी को असहज करते रहे हैं। प्रदेश के पूर्वांचल इलाक़े के राजभर समुदाय में अच्छा प्रभाव रखने वाली सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने मंगलवार को 39 लोकसभा सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नामों का एलान भी कर दिया। राजभर की बीजेपी से नाराज़गी इस कदर दिखी कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह के ख़िलाफ़ भी अपने प्रत्याशी खड़े कर दिए हैं।
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उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी से गठबंधन करने वाली ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा के चार विधायक जीते थे। योगी मंत्रिमंडल में ओमप्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री हैं। 

राजभर की नाराज़गी दूर करने के लिए योगी सरकार ने सुभासपा के आठ लोगों को मंत्री पद का दर्जा देते हुए विभिन्न आयोगों, परिषदों व निगमों में समायोजित किया था। समायोजित होने वालों में ओमप्रकाश राजभर के बेटे और पार्टी के प्रवक्ता राणा अजीत सिंह भी शामिल थे।

चार सीटें माँग रहे थे राजभर

ओमप्रकाश राजभर के साथ बीजेपी की लोकसभा सीटों को लेकर जद्दोजहद लंबे समय से चल रही है। ओमप्रकाश बीजेपी से राजभर बहुल चार लोकसभा सीटें माँग रहे थे। इसको लेकर उनकी कई बार बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से बातचीत भी हुई थी। राजभर यूपी सरकार में अपने लोगों का और ज़्यादा समायोजन न होने से भी नाराज़ थे। 

चुनावों का बिगुल बजते ही राजभर ने बीजेपी नेतृत्व से घोसी, ग़ाज़ीपुर, जौनपुर, सलेमपुर, बलिया और चंदौली सीटों की माँग रख दी थी। बात न बनने पर ओमप्रकाश ने एक बार तो मंत्री पद भी छोड़ने की पेशकश कर दी थी। 

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शाह ने नहीं मानी बात

बीजेपी ने उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को उन्हें मनाने के लिए लगाया था। राजभर सीटों की माँग पर अड़े रहे और अंत में तीन सीटों पर आ गए। हालाँकि अमित शाह ने अनुप्रिया पटेल की अपना दल को दो सीटें देते हुए सुभासपा को कोई सीट देने के इनकार कर दिया था। शाह का तर्क था कि ओमप्रकाश राजभर के साथ गठबंधन विधानसभा चुनावों के लिए है न कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए।

बीजेपी नेताओं के मुताबिक़, बात न बनते देख ओमप्रकाश राजभर को बलिया या घोसी में से कोई एक सीट को देने की पेशकश की गयी। इन दोनों सीटों पर भी बीजेपी ने ओमप्रकाश राजभर से ख़ुद के या बेटे के लड़ने की शर्त रखी। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा की सीट ग़ाज़ीपुर पर तो बीजेपी ने पूरी तरह हाथ खड़े कर दिए जबकि प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडे की चंदौली सीट पर भी टके का जवाब दे दिया। 
बीजेपी के अड़ियल रवैये से नाराज़ राजभर धमकी देकर सोमवार को बलिया चले गए और वहाँ अपनी पार्टी के नेताओं से दिन भर वार्ता की। बलिया में ही अपने प्रत्याशियों के नाम तय करने के बाद राजभर सोमवार देर रात लखनऊ पहुँचे और मंगलवार सुबह प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर सूची जारी कर दी।

गठबंधन, कांग्रेस के भी संपर्क में थे 

ओमप्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस के साथ भी संभावनाएँ तलाशी थीं। गठबंधन में तो सपा मुखिया अखिलेश यादव उन्हें लेने के लिए तैयार भी हो गए थे पर मायावती घोसी सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुईं और न ही बलिया सीट पर सपा के कद्दावर नेता नीरज शेखर माने। 

सपा ने राजभर को बदले में चंदौली और सलेमपुर सीट देने की पेशकश की पर ओमप्रकाश उतने भर से संतुष्ट नहीं थे। ओमप्रकाश राजभर ने बीजेपी नेतृत्व पर दबाव बनाने के लिए कांग्रेस से बातचीत भी आगे बढ़ाई।

कांग्रेस ने राजभर की तमाम माँगों पर सहमति भी जतायी पर बाद में सुभासपा खुद ही पीछे हट गयी। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ओमप्रकाश राजभर तालमेल के लिए गंभीर नहीं थे बल्कि वह बीजेपी के साथ सौदेबाज़ी में अपना भाव ऊँचा रखना चाहते थे।

बीजेपी नहीं देगी भाव

बीजेपी के लिए लगातार मुसीबत का सबब बने ओमप्रकाश राजभर को अब पार्टी भाव देने के मूड में नहीं है। सोमवार को ओमप्रकाश राजभर के एलान के बाद किसी बीजेपी नेता ने उनसे संपर्क नहीं साधा। 

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योगी ने नहीं दिया मिलने का समय

रविवार रात को ओमप्रकाश राजभर अपने बेटे राणा अजीत सिंह के साथ मंत्री पद से इस्तीफ़ा देने मुख्यमंत्री आवास भी पहुँचे थे। मुख्यमंत्री से न मिल पाने पर उन्होंने अपना इस्तीफ़ा वहाँ के सुरक्षाकर्मियों को देने की असफल कोशिश की। ओमप्रकाश राजभर ने मुख्यमंत्री से इस्तीफ़ा देने का समय भी माँगा जो उन्हें नहीं मिला।

मंगलवार सुबह उन्होंने बीजेपी नेताओं को फ़ोन कर प्रत्याशियों की सूची जारी करने की सूचना दी पर कोई भाव नहीं मिला। बीजेपी नेताओं का कहना है कि अड़ियल ओमप्रकाश राजभर को जल्दी ही मंत्री पद से हटा दिया जाएगा। इतना ही नहीं उनके साथियों को दिया गया मंत्री पद का दर्जा भी वापस ले लिया जाएगा।

कुमार तथागत
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