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अमित शाह जी, हिंदी बोलने और थोपने में फ़र्क़ है

हमारे देश की जटिल, सामाजिक और कई परतों वाली संस्कृति और उससे जुड़ी भाषाओं के बारे में बीजेपी के लगभग सभी नेताओं की समझ कमोबेश कमज़ोर रही है। उनकी मान्यता है कि बहुसंख्यक संस्कृति ही वास्तविक संस्कृति होती है और उसका उद्देश्य है -  ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’।
मंगलेश डबराल

आख़िरकार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को अपना बयान वापस लेना पड़ा या पूरी लीपापोती करनी पड़ी। उन्होंने एक हिंदूवादी हिंदी संस्था में भाषण देते हुए यह इच्छा व्यक्त की थी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया जाना चाहिए। लेकिन जब अगले ही दिन उनकी अपनी पार्टी बीजेपी के एक मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने इसका विरोध करते हुए कहा कि भाषा के मसले पर कोई समझौता नहीं हो सकता, तो अमित शाह ने ख़तरे को भांप लिया और हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में मान्यता दिए जाने की ज़रूरत बताई। 

शाह को इसका ख़याल नहीं आया कि हिंदी पहले से ही देश की संपर्क-भाषा और राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित है, यानी उसे अलग-अलग राज्यों और समुदायों की मातृभाषाओं के साथ दूसरी भाषा का दर्जा प्राप्त है और उसे फिर से ‘दूसरी भाषा’ बतलाना नितांत अप्रासंगिक है। उन्हें यह भी याद नहीं आया कि आज़ादी के बाद विभिन्न राज्यों का गठन भाषाई आधार पर हुआ था। 

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समाज, इतिहास, संस्कृति और भाषा की समझ न हो तो ऐसा ही होता है। हमारे देश की जटिल, सामाजिक और कई परतों वाली संस्कृति और उससे जुड़ी भाषाओं के बारे में बीजेपी के लगभग सभी नेताओं की समझ कमोबेश कमज़ोर रही है। उनकी मान्यता है कि बहुसंख्यक संस्कृति ही वास्तविक संस्कृति होती है और उसका उद्देश्य है -  ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’। 

यह भी सच है कि केंद्र सरकार में इस समय ऐसे नेताओं का बहुमत है जिन्हें हिंदी का मोटा-मोटा ज्ञान तो है लेकिन उसके सांस्कृतिक भंडार का पता लगभग नहीं है और उन्हें अंग्रेज़ी भी ठीक से नहीं आती। ये दो तथ्य मिलकर बीजेपी के इस तर्क को निर्मित करते हैं कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। 

लेकिन बात सिर्फ़ इतनी नहीं है। बड़ा ख़तरा यह है कि अमित शाह का बयान देश के संघीय ढांचे में हस्तक्षेप करने और उसे तोड़ने की कोशिश है।  संविधान इस संघीय संरचना की गारंटी देता है।  अंग्रेज़ उपनिवेशवादियों ने भारत के राज्यों का गठन प्रशासनिक सुविधा के नज़रिये से किया था जिसमें जातीय, भाषाई, सांस्कृतिक और रहन-सहन की विविधताओं पर कोई विचार नहीं किया गया। 

आज़ादी के बाद सभी राज्यों का भाषावार पुनर्गठन हुआ और विभिन्न अंचलों की भाषाओं को क्षेत्रीय, आंचलिक, सामुदायिक भाषाओं, उपभाषाओं और बोलियों के आधार पर मान्यता मिली। लोगों की अस्मिताओं को रेखांकित करने और उन्हें संरक्षण देने की दिशा में यह एक बड़ा क़दम था।
हमारी विभिन्न भाषाओं के बीच कई तरह के विवाद, भिन्नताएं और अलगाव पहले से मौजूद रहे हैं और यह ज़रा भी अस्वाभाविक नहीं था, लेकिन अंग्रेज़ पूरी धूर्तता के साथ उन्हें दबाए रहे। वे एक ही उद्गम और अंचल से जन्मी हिंदी और उर्दू में अलगाव करने में ज़रूर सफल हुए, लेकिन वह एक दूसरी बहस है। 

भाषाओं को राज्य की मान्यता मिलने के बाद उनकी रचनाशीलता भी विकसित हुई जिसके नतीजे में आज 22 भाषाएं संविधान द्वारा स्वीकृत हैं, केंद्रीय साहित्य अकादमी 24 भाषाओं के साहित्य को मान्यता और पुरस्कार देती है और नेशनल बुक ट्रस्ट जैसी राष्ट्रीय प्रकाशन संस्था इससे भी अधिक भाषाओं का साहित्य प्रकाशित करती है। 

उत्तर-पूर्व की अनेक छोटी-छोटी भाषाओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और उनमें से कुछ को मान्यता भी मिली है। साहित्य अकादमी जैसी संस्था भाषाओं में छोटे-बड़े का कोई भेद नहीं करती और सभी भाषाओं के साहित्य के लिए हर वर्ष एक-एक राष्ट्रीय पुरस्कार देती है।
लेकिन भाषाओं की दुनिया इससे भी बड़ी है।  विख्यात भाषाविद् डॉ. गणेश देवी ने पिछले दिनों देश का एक व्यापक भाषाई जन-सर्वेक्षण किया था जिसका निष्कर्ष यह था कि देश में लगभग 780 ऐसी भाषाएं हैं जिनकी अपनी लिपि और लोकसाहित्य है। विभिन्न छोटे-छोटे समूहों और जातियों-उपजातियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को भी जोड़ा जाए तो यह संख्या तीन हज़ार से भी अधिक है। 
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सन 1961 में हुए एक सरकारी सर्वेक्षण में भारत में बोली जाने वाली भाषाओं की तादाद 1652 बतायी गयी है। गणेश देवी का मानना है कि हम सिर्फ़ ‘भाषाओं का उपवन नहीं हैं बल्कि भाषाओं का जंगल हैं।’ इस जंगल में हिंदी भी है जो इस अर्थ में सबसे बड़ी भाषा है कि उसे सबसे अधिक लोग बोलते-समझते हैं। 

एक दावे के अनुसार, हिंदी चालीस करोड़ लोगों द्वारा बोली-समझी जाती है और ग़रीबी के बावजूद हमारी ‘हिंदी-पट्टी’ सबसे बड़ा भाषाई अंचल है। उसकी अहमियत को देखते हुए सरकार ने उसे राजभाषा के पथ पर बिठाया और यह भी सच है कि स्वाधीनता के संघर्ष में हिंदी बड़ी हद तक शामिल रही। लेकिन इस आधार पर वह सबसे अधिक अधिकार-संपन्न नहीं हो सकती और न इस तर्क से कि वह संस्कृत की कोख से पैदा हुई है।

तमिलनाडु की भाषा तमिल संस्कृत से भी प्राचीन होने का दावा करती है और सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि तक अपना रिश्ता जोड़ती है। इस आधार पर वह भी राष्ट्रभाषा बनने की दावेदार हो सकती है।

आधुनिक तमिल और हिंदी का विवाद भी ऐसे ही तर्कों से पैदा हुआ है और जब भी हिंदी को समूचे देश में लागू किए जाने की बात उठती है तो पहला विरोध तमिलनाडु से होता है। एक समय वह था जब स्वाधीनता संघर्ष के दौरान महात्मा गांधी ने तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत में कई जगहों पर हिंदी प्रचारिणी संस्थाओं की शुरुआत की थी और बहुत से लोगों ने स्वेच्छा से हिंदी सीखी, लेकिन जब राजभाषा होने के वर्चस्व के कारण उसे ग़ैर-हिंदी क्षेत्रों में लागू करने की बात उठी तो उसके विरोध की राजनीति भी सक्रिय हुई। 

द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम की राजनीति लंबे समय तक हिंदी विरोध पर टिकी रही। हाल के वर्षों में वह शांत हो गई थी लेकिन अमित शाह जैसे ज़िम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं के बयान उसे फिर से हवा दे सकते हैं।

दरअसल, हिंदी और उर्दू मातृभाषाएं कभी नहीं रहीं। दोनों लोक नहीं, बल्कि ‘नागर’ भाषाओं के तौर पर ‘निर्मित’, गोद ली हुईं और बनायी हुईं भाषाएं हैं। अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, पंजाबी, राजस्थानी, डोगरी, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी आदि को उत्तर भारतीय जन की मातृभाषाएं कहा जा सकता है। 

नेशनल बुक ट्रस्ट ने तो हिमाचली पहाड़ी में किताबें भी प्रकाशित की हैं। हिंदी और उर्दू का जन्म ब्रज भाषा, लोकभाषाओं और फ़ारसी से हुआ। बहुत से  मुग़ल बादशाह ब्रज भाषा में कविता करते थे (उनका एक संकलन पिछले दिनों प्रकाशित हुआ जिसे ‘मुग़ल बादशाहों की हिंदी कविता’ कहा गया)। इसी तर्क से हिंदी साहित्य के इतिहास में ब्रज, अवधी और अपभ्रंश आदि की अत्यंत समृद्ध कविता को ‘हिंदी कविता’ कहा गया। कहने का अर्थ यह है कि इन सभी भाषाओं को हिंदी साहित्य में ‘समाहित’ कर  दिया गया। हिंदी की विडंबनाओं में से एक यह भी है। 

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आज जब विभिन्न क्षेत्रीय और आंचलिक अस्मिताएं, आदिवासी जन, उपजातियां और दलित समुदाय अपनी पहचान का संघर्ष तेज़ कर रहे हैं, उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम भी अपनी अस्मिता और मान्यता को लेकर जागरूक हो रहे हैं। हाल के वर्षों में संथाली, मुंडारी, बोडो, गोंडी, कोकबोराक जैसी अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं पर विभिन्न संस्थाओं का ध्यान गया है और उनके साहित्य को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध हो रहे हैं। 

भाषाओं के इस लोकतंत्र में अगर किसी एक भाषा को सबकी भाषा बनाने की मांग की जाती है तो यह लोकतंत्र पर तानाशाही को लादने जैसा काम होगा। लेकिन विडंबना यह है कि बीजेपी की वर्तमान सत्ता ‘एक राष्ट्र, एक धर्म, एक चुनाव, एक टैक्स’ के साथ ‘एक भाषा’ का सपना देखती रहती है और जब भी अवसर मिले, अपने इस एजेंडे को बढ़ाती रहती है, जिसका साकार होना लगभग असंभव है लेकिन उससे अशांति ज़रूर फैल सकती है। कश्मीर से लेकर असम तक अशांतियों के इस माहौल में यह एक नई अशांति होगी। हमें हिंदी बोलने और हिंदी थोपने के फ़र्क़ को रख कर चलना चाहिए। 

मंगलेश डबराल
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