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अनुच्छेद 370 : शेर जिसके दाँत और नाखून उखाड़ लिए गए हैं

अनुच्छेद 370 पर विशेष :  भारतीय संसद पहले जहाँ जम्मू-कश्मीर में 38 विषयों पर क़ानून बना सकती थी वहीं अब केंद्र के अधिकार वाले 97 विषयों में से 94 विषयों पर क़ानून बना सकती है। भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से 260 आज जम्मू-कश्मीर पर लागू होते हैं। तो क्या अनुच्छेद 370 एक सर्कसिया शेर की तरह नहीं है और इस शेर को मारने के लिए काग़ज़ी तलवारें नहीं भाँजी जा रही हैं? अनुच्छेद 370 पर इस सीरीज़ की पाँचवीं कड़ी में पाएँ इन्हीं सवालों के जवाब।
नीरेंद्र नागर

संविधान के अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के लिए संघ परिवार की तरफ़ से पहले भी आवाज़ें उठी हैं और इन दिनों फिर उठ रही है। पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने पिछले दिनों इसे समाप्त करने की बात संसद में कही तो गत सप्ताह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने भी उम्मीद जताई कि मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी इस दफ़ा इसे हटाने का अपना वादा अवश्य पूरा कर पाएगी।

हालाँकि कई लोग इससे सहमत नहीं हैं। सहमत इसलिए नहीं कि उन्हें लगता है कि संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता। दूसरे, यदि केंद्र सरकार ऐसा करना चाहे तो भी सरकार के पास संसद में उतना बहुमत नहीं है। लेकिन बीजेपी ऐसा कर सकती है या नहीं? अगर हाँ तो कैसे? अगर नहीं तो उसके रास्ते में कौन-कौन-से काँटे हैं? इन सबके बारे में हम आगे चर्चा करेंगे। उससे पहले हमारे लिए यह जानना उचित होगा कि बीजेपी के नेता और मंत्री ‘नेहरू सरकार द्वारा पैदा किए गए जिस भयानक जानवर’ के विनाश के लिए दफ़्ती की तलवारें भाँज रहे हैं, उस जानवर में कोई जान बची भी है क्या! और अगर बची भी है तो कहीं ऐसा तो नहीं कि 69 साल का यह बूढ़ा जानवर चिड़ियाघर या सर्कस का एक शेर बनकर रह गया है।

अनुच्छेद- 370 : पार्ट-1, 2, 3 और 4

अनुच्छेद 370 पर हम पहली किस्त में बात कर चुके हैं जिससे हमें यह पता चला था कि इस अनुच्छेद के चलते ‘जम्मू-कश्मीर का एक अलग संविधान है, झंडा है, उसके नागरिकों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं, और सबसे बड़ी बात - भारत की संसद केवल उन मामलों पर राज्य के लिए क़ानून बना सकती है, जिनके बारे में भारत के साथ विलय करते समय हस्ताक्षरित विलय पत्र में उल्लेख है। बाक़ी मामलों पर क़ानून बनाने के लिए उसे राज्य सरकार की सहमति चाहिए।’ आपने ध्यान दिया, जम्मू-कश्मीर को यह सीमित स्वायत्तता भारत सरकार ने ‘अपनी मर्ज़ी से’ नहीं दे दी थी। वह उस विलय पत्र की अनिवार्य शर्त थी और अगर भारत सरकार ने वह सशर्त विलय पत्र नहीं स्वीकार किया होता तो आज कश्मीर या तो स्वतंत्र होता या पाकिस्तान का हिस्सा होता। ख़ैर, आज हम विलय पत्र की बात नहीं करेंगे क्योंकि उसपर हम पहले चर्चा कर चुके हैं।

जम्मू-कश्मीर को कितनी स्वायत्तता है?

आज हम बात कर रहे हैं कि अनुच्छेद 370 की वर्तमान में क्या स्थिति है और उसके रहने या न रहने से क्या कोई अंतर पड़ता है।

26 जनवरी 1950 को जब अनुच्छेद 370 भारत के बाक़ी संविधान के साथ लागू हुआ था, तब उसके तहत संसद को विदेश, संचार और रक्षा तथा कुछ अन्य मामलों से जुड़े कुल 38 विषयों पर ही क़ानून बनाने का अधिकार था लेकिन आज- 

  • वह केंद्र के अधिकार वाले 97 विषयों में से 94 विषयों पर जम्मू-कश्मीर के लिए क़ानून बना सकती है। 
  • भारतीय संविधान के 395 अनुच्छेदों में से 260 आज जम्मू-कश्मीर पर लागू होते हैं।
  • समवर्ती सूची में 47 विषय हैं जिनमें से 26 विषयों पर केंद्र सरकार क़ानून बना सकती है।
  • भारतीय संविधान की 12 अनुसूचियों में से 7 अनुसूचियाँ जम्मू-कश्मीर पर लागू होती हैं।

अनुच्छेद 370 का फ़ायदा केंद्र ने उठाया!

अब आप शायद जानना चाहेंगे कि आख़िर यह जादू कैसे हुआ? केंद्रीय विषयों की सूची 26 से 94 तक कैसे पहुँची? तो यह जादू अनुच्छेद 370 के मार्फ़त ही हुआ जिसके नाम पर आज इतना रोना-पीटना चल रहा है। आप इस आर्टिकल का तीसरा पैरा फिर से पढ़ें। उसमें लिखा है कि ‘राज्य सरकार की सहमति’ से केंद्र अन्य मामलों में भी अपने क़ानून राज्य पर लागू कर सकता है। बस इसी का सहारा लेकर केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति के आदेशों के ज़रिए ये तमाम क़ानून राज्य पर लागू किए। अगस्त 1953 में शेख़ अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी के बाद राज्य में जितनी भी सरकारें बनीं, उनमें से किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि वह केंद्र के प्रस्ताव पर चूँ-चपड़ करे क्योंकि शेख़ का अंजाम हर किसी को याद था। वैसे भी पहले चुनाव से ही वहाँ जिस तरह की गड़बड़ियाँ होनी शुरू हुईं और 75 सीटों में से 30-40-50 उम्मीदवार बिना चुनाव लड़े ही विजयी घोषित कर दिए जाते थे, उससे आप समझ सकते हैं कि केंद्र सरकार वहाँ किस तरह अपनी गोटियाँ फ़िट कर रही थी। माना जाता है कि 1977 में देश में दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद पहली बार जम्मू-कश्मीर में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए।

केंद्र ने जम्मू-कश्मीर की सत्ता में बैठे जी-हुजूरियों की ‘सहमति और सहयोग’ से केंद्र के तमाम क़ानूनों को जम्मू-कश्मीर में लागू तो करवा दिया लेकिन उसे डर था कि कहीं उसके इस काम को अदालत में चुनौती न मिल जाए। इसलिए उसने एक’ चतुराई भरा’ काम यह किया कि 1954 के बाद जो 47 नए राष्ट्रपति आदेश जारी हुए हैं, वे पुराने आदेश के स्थान पर नहीं, बल्कि 1954 वाले आदेश में संशोधन के रूप में जारी किए गए। यह इसलिए किया गया कि कल को यदि सवाल उठे कि 1957 में राज्य संविधान सभा के भंग होने के बाद राष्ट्रपति कोई नया आदेश निकाल सकते हैं या नहीं, तो यह कहा जा सके कि नया आदेश तो कोई निकला ही नहीं। जो निकला, वह पुराने आदेश में संशोधन करने के लिए था और पुराना आदेश संविधान सभा की सिफ़ारिशों के आधार पर जारी हुआ था।

राज्य के पास क्या हैं अधिकार?

इतना सब होने के बाद आज की तारीख़ में क्या राज्य के हाथ में कोई अधिकार बचे भी हैं? जी हाँ, कई हैं जैसे शादी और तलाक़, शिशु और नाबालिग़, कृषिभूमि के अलावा बाक़ी संपत्ति का हस्तांतरण, अनुबंध और अपकृत्य, दिवाला, न्यास, अदालत, परिवार नियोजन और दातव्य से संबंधित मामले। इन सब विषयों पर तथा स्थानीय निकायों में चुनावों के बारे में क़ानून बनाने का अधिकार राज्य सरकार के पास अब भी है। 

जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिली हुई ‘स्वायत्तता’ की असलियत क्या है? इसे यूँ समझिए कि घर में खाना क्या पकेगा, मेहमानों में कौन-कौन आएगा, कौन कहाँ बैठेगा, यह तय करने का ‘अधिकार’ तो ममी-पापा को है और सलाद पर नींबू निचोड़ने की ‘स्वायत्तता’ बच्चे को मिली हुई है।

35ए बना आँख का काँटा

हाँ, एक अधिकार अभी बचा है जम्मू-कश्मीर सरकार और वहाँ के लोगों के पास जिसका अभी छीना जाना बाक़ी है। वह है राज्य के ‘स्थायी निवासियों’ को हासिल विशेषाधिकार। इन विशेषाधिकारों पर कई लोगों की नज़र है और वे उसे समाप्त करवाना चाहते हैं। लेकिन इन विशेषाधिकारों के लिए कवच के रूप में कार्य करता है भारतीय संविधान में मौजूद अनुच्छेद 35ए जिसके कारण कोई इनका बाल भी बाँका नहीं कर सकता।

क्या है यह अनुच्छेद 35ए है, और भारतीय संविधान में यह कैसे आया और क्यों आया, इसकी पड़ताल करने से पहले यह समझना ज़रूरी है कि इसमें आए ‘स्थायी निवासी’ शब्द का अर्थ क्या है।

बात 1947 से भी पीछे जाती है जब जम्मू-कश्मीर राजा के अधीन था और पंडितों ने माँग की थी कि राज्य सरकार की नौकरियाँ सिर्फ़ कश्मीरियों को मिलें। इसके लिए 1927 और 1932 में दो अधिसूचनाएँ जारी की गईं जिनके आधार पर रियासत के निवासियों की कई श्रेणियाँ तय की गईं। इनमें से कुछ को स्थायी निवासी का दर्ज़ा देकर उनको नौकरियों और ज़मीन की ख़रीद के मामले में विशेषाधिकार मिले जो कि बाक़ी लोगों को नहीं थे।

‘स्थायी निवासी’ का विशेषाधिकार कब से?

यानी कश्मीर में ’स्थायी निवासी’ के तौर पर राज्य के लोगों को ये ‘विशेषाधिकार’ पहले से प्राप्त थे। लेकिन क्या ये अधिकार 26 अक्टूबर 1947 को राज्य का भारत में विलय होते ही ‘क़ानूनन’ ख़त्म नहीं हो जाने चाहिए थे? नहीं, क्योंकि विलय पत्र में ही लिखा था कि केवल तीन मामलों में भारत का क़ानून राज्य पर लागू होगा। बाक़ी मामलों में राज्य के मौजूदा क़ानून चलते रहेंगे। यही बात अनुच्छेद 370 में भी दोहराई गई जिसमें लिखा था कि भारतीय संसद ‘विलय पत्र में वर्णित विषयों’ पर ही राज्य के लिए क़ानून बना सकेगी। बाक़ी किसी मामले में राज्य सरकार की सहमति से ही कोई केंद्रीय क़ानून राज्य पर लागू किया जा सकेगा।

इसका मतलब यह कि यदि राज्य के निवासियों को 1947 से पहले से कोई विशेषाधिकार मिले हुए थे तो ये तभी समाप्त हो सकते हैं यदि वहाँ की नई सरकार ऐसा चाहती। लेकिन क्या वहाँ की नई सरकार यह चाहती थी? आइए देखें कि 1952 के दिल्ली अग्रीमेंट पर, जिसमें राज्य के स्थायी निवासियों का मसला भी था, संसद में अपना वक्तव्य पढ़ते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने क्या बताया था।

‘नागरिकता का मामला भी स्पष्ट रूप से उठा। वहाँ के नागरिकों को पूरी नागरिकता मिलेगी। लेकिन हमारे कश्मीरी दोस्त एक-दो मामलों को लेकर बहुत आशंकित थे। बहुत लंबे समय से, महाराजा के समय से, वहाँ ऐसे क़ानून बने हुए थे जो किसी बाहरी व्यक्ति को, यानी कश्मीर के बाहर से आए किसी व्यक्ति को कश्मीर में ज़मीन ख़रीदने या रखने पर बंदिश लगाते थे। अगर मैं बताऊँ तो पुराने दिनों में महाराजा को इस बात का बड़ा भय लग रहा था कि रियासत में भारी संख्या में आने वाले और बसने वाले अँग्रेज़ (वहाँ के) सुहाने मौसम के चलते कहीं ज़मीनें ख़रीदना शुरू न कर दें। सो हालाँकि ब्रिटिश राज में महाराजा से बहुत सारे अधिकार छीन लिए गए लेकिन महाराजा इस बात पर डटे रहे कि बाहर का कोई व्यक्ति राज्य में ज़मीन नहीं ख़रीद सके। और वह (आज भी) जारी है।

इसलिए जम्मू-कश्मीर की वर्तमान सरकार उस अधिकार को बनाए रखने के लिए बहुत चिंतित है क्योंकि उसे डर है, और मेरे हिसाब से उनका यह डर वाजिब है, कि कहीं सारा-का-सारा कश्मीर उन लोगों की ज़ागीर न बन जाए जिनकी एकमात्र योग्यता यही है कि उनके पास बेशुमार दौलत है, और जो सारी आकर्षक जगहें ख़रीद लें और हासिल कर लें। अब वे चाहते हैं कि महाराजा के समय के क़ानूनों को बदलकर उदार बनाना जाए लेकिन यह नहीं चाहते कि कश्मीर की ज़मीन ख़रीदने पर बाहरी लोगों पर जो रोक लगी है, उसे हटाया जाए।

जो हो, हम इससे सहमत हैं कि इस मामले को सुलझाया जाए। राज्य की प्रजा की जो पुरानी परिभाषा थी, वह (राज्य की प्रजा को) ज़मीन ख़रीदने, नौकरियों और दूसरी छोटी-मोटी चीज़ों में, मेरे ख़्याल से सरकारी वज़ीफ़ों और बाक़ी मामलों में कुछ विशेषाधिकार देती थी। सो हम उनसे सहमत हुए और यह दर्ज़ कर लिया : राज्य विधानसभा को राज्य के स्थायी निवासियों को परिभाषित करने और उनके अधिकारों और विशेषाधिकारों को नियमित करने का अधिकार होगा, ख़ासकर उन मामलों में जो अचल संपत्ति हासिल करने, नौकरियों में भर्तियाँ होने आदि से जुड़े हैं। तब तक राज्य में जो क़ानून लागू है, वह चलता रहेगा।’

विचार से ख़ास

अनुच्छेद 35ए क्यों जोड़ा गया?

जैसा कि हम पहले चर्चा कर चुके हैं, केंद्र और राज्य के संवैधानिक अधिकारों पर व्याप्त भ्रम की स्थिति को समाप्त करने के लिए 1952 में नेहरू और शेख़ अब्दुल्ला की टीमें दिल्ली में एकसाथ बैठी थीं और इस बैठक में केंद्र ने मान लिया कि राज्य सरकार कश्मीर के निवासियों को पहले से चले आ रहे विशेषाधिकार दे सकती है। ऊपर हमने नेहरू का जो वक्तव्य लिखा, वह इसी के बारे में था। परंतु इसमें एक चक्कर था। चक्कर यह कि यदि जम्मू-कश्मीर की सरकार ने क़ानून बनाया कि कश्मीर के स्थायी निवासियों को ही राज्य में ज़मीन ख़रीदने का अधिकार है या वही राज्य में नौकरी कर सकते हैं और जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भारतीय नागरिक यह कहते हुए अदालत में चला जाए कि भारतीय नागरिक के तौर पर मुझे भी जम्मू-कश्मीर में ज़मीन ख़रीदने का या नौकरी करने का अधिकार मिले तो क्या होगा? क्या होगा अगर अदालत ने उस क़ानून को अवैध बता दिया? इसी के लिए भारतीय संविधान में अनुच्छेद 35ए जोड़ा गया।

अनुच्छेद 35ए ज़्यादा कुछ नहीं कहता। वह बस कुछ विषय गिनाता है और कहता है कि इन विषयों पर अगर राज्य में कोई क़ानून फ़िलहाल लागू है या भविष्य में विधानसभा द्वारा बनाया गया तो उसे किसी भी सूरत में अमान्य (समाप्त) नहीं किया जा सकेगा।

और ये विषय हैं - राज्य का स्थायी निवासी कौन होगा, उसे क्या-क्या सुविधाएँ होंगी या उसपर क्या-क्या बंदिशें होंगी या नौकरियों, ज़मीन ख़रीदने, बसने और छात्रवृत्तियों आदि में मामले में उसे क्या-क्या विशेषाधिकार होंगे?

यानी अनुच्छेद 35ए भारतीय संविधान में बैठा वह नाग है जो जम्मू-कश्मीर के लोगों - चाहे वे मुसलमान हों, पंडित हों या बौद्ध - सभी के विशेषाधिकारों की सुरक्षा कर रहा है। यही कारण है कि राज्य में 35ए को बचाए रखने के लिए भारी समर्थन है।

लेकिन राज्य के बाहर के कुछ लोग इस नाग की हत्या करना चाहते हैं और अनुच्छेद 370 नाम के उस सर्कसिया शेर की भी जिसका हमने ऊपर ज़िक्र किया। इस मक़सद से सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिकाएँ लंबित हैं और उम्मीद है कि जल्दी ही दोनों पर फ़ैसला आ जाएगा। अच्छा है, इससे स्पष्टता आ जाएगी कि अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए को समाप्त किया जा सकता है या नहीं, और यदि हाँ तो उससे भारत और जम्मू-कश्मीर के संबंधों पर क्या असर पड़ेगा। कोर्ट को अपना फ़ैसला देते समय संविधान में मौजूद कुछ अन्य अनुच्छेदों पर भी ग़ौर करना होगा जिनके तहत कुछ अन्य राज्यों में भी ज़मीन ख़रीदने-बेचने और दूसरे मामलों आदि पर इसी तरह की बंदिशें या रियायतें हैं।

वैसे, 2015 में जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय और 2018 में सर्वोच्च न्यायालय दोनों इसपर यह राय दे चुके हैं कि शीर्षक में ‘अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान’ लिखा होने के बावजूद अनुच्छेद 370 अब स्थायी हो गया है। ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा और क्या इसके बावजूद अनुच्छेद 370 को ख़त्म किया जा सकता है, इसपर चर्चा करेंगे हम अगली कड़ी में जो इस सीरीज़ की आख़िरी कड़ी होगी।

नीरेंद्र नागर
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