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अफ़ग़ानिस्तान: धर्मान्धता की राह पर चलने वाले देशों के लिये मिसाल?

जिन तालिबानों को अमेरिका 'अच्छे' और 'बुरे' दो अलग-अलग श्रेणी के तालिबान बताकर और अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने से पूर्व स्वयं तथाकथित 'अच्छे तालिबानों' से बातचीत करता रहा और अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ते ही अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता जिन तालिबानों के हाथ लगी, अब धीरे धीरे वही तालिबान अपने वास्तविक रूप में आकर यह प्रमाणित करने लगे हैं कि दरअसल तालिबानों में 'अच्छा तालिबानी' कोई नहीं। बल्कि सभी महिला विरोधी, मानवाधिकारों के दुश्मन, क्रूर तथा कट्टरपंथी अतिवादी विचारधारा रखने वाले एक ही तालिबानी हैं।

ये वही तालिबानी हैं जिन्होंने अपनी कट्टरता का सबसे बड़ा सुबूत मार्च 2001 में बामियान में बुद्ध की दो विशालकाय मूर्तियों को नष्ट कर के दिया था। बताया जाता है- ‘जब तालिबान अपने टैंक, विमानभेदी तोपों तथा टैंकों के गोले दाग़ने के बावजूद पथरीले पहाड़ों में उकेरी गई दुनिया की सबसे प्राचीन, मज़बूत व ऊँची बुद्ध प्रतिमाओं को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सके तो वे कई ट्रकों में डाइनामाइट भर कर लाए और उन्हें उन मूर्तियों में ड्रिल कर भर दिया।' क्रूर कट्टर तालिबान इन मूर्तियों को नष्ट करने के लिए इतने उतावले थे कि उन्होंने लगभग एक महीने तक उन्हें नष्ट करने की प्रक्रिया जारी रखी। तालिबानी क्रूरता व कट्टरपंथ की यह ख़बर उन दिनों पूरे विश्व में प्रसारित होती रही।

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तालिबान के नेता मुल्ला उमर ने 26 फ़रवरी, 2001 को अफ़ग़ानिस्तान में सभी मूर्तियों को गिराने का आदेश दिया था। काबुल के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी गई मूर्तियों को भी ध्वस्त कर दिया गया था। ये वही क्रूर तालिबानी थे जिन्होंने 25 सितंबर, 1996 को पहली बार काबुल पर कब्ज़ा करने और अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ाबिज़ होने के दो दिनों के भीतर ही यानी 27 सितंबर को भारत के क़रीबी समझे जाने वाले अफ़ग़ान नेता व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह के सिर में गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी तथा उनके मृत शरीर को एक क्रेन से लटका दिया था। मूक दर्शक बनी यह दुनिया उसी समय तालिबानियों की क्रूरता से दहल उठी थी।

तालिबान ने 1996 में सत्ता हथियाने के फ़ौरन बाद महिलाओं के ऊँची एड़ी की चप्पलें और जूते पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उनका घरों से बाहर निकलना प्रतिबंधित कर दिया था। बहुत ही ज़रूरी हालात में निकलने पर महिलाओं को कथित इस्लामी शरिया क़ानून के तहत अपने आप को पूरी तरह ढँक कर निकलने की ही इजाज़त थी। 

तालिबानों ने यह फ़रमान भी जारी किया था कि 'अफ़ग़ानी महिला मरीज़ों को सिर्फ़ महिला डॉक्टरों के पास ही जाना होगा। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने ड्राइवरों को भी चेतावनी दी थी कि वे बिना बुर्क़े वाली महिलाओं को अपनी कार में हरगिज़ न बिठायें। और यदि ड्राइवर इस आदेश का उल्लंघन करेगा तो ड्राइवर के साथ-साथ उस महिला व उसके पति को भी सज़ा दी जाएगी।'

9 /11 के अमेरिका पर हमले के बाद अमेरिकी नेतृत्व में नाटो सेना द्वारा अपदस्थ किया गया वही क्रूर व कट्टरपंथी तालिबान एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता पर क़ाबिज़ हो चुका है और उसने फिर से वही मानवता विरोधी रंग दिखाने शुरू कर दिये हैं।

फिर से नित्य नये नये फ़रमान जारी किये जाने लगे हैं। भयंकर महंगाई, चौपट अर्थव्यवस्था, भुखमरी व अस्थिरता के दौर से गुज़र रहे अफ़ग़ानिस्तान के तालिबानी शासकों को देश की तरक़्क़ी कैसे हो, इससे ज़्यादा फ़िक्र इस बात की है कि देश में जल्द से जल्द उनका स्वनिर्मित 'शरिया क़ानून ' कैसे लागू हो। इसीलिये अब उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी दफ़्तरों में कार्यरत मर्दों के लिये नया ड्रेस कोड लागू किया है। इसके अनुसार पुरुषों के लिये अब दाढ़ी रखना अनिवार्य होगा। वे कार्यालयों में पश्चिमी परिधान अर्थात पैंट, शर्ट, कोट, टाई आदि नहीं पहन सकते हैं। बजाय इसके उन्हें अपना सिर ढँकने के लिए टोपी या पगड़ी तथा पारंपरिक लंबे अफ़ग़ानी ड्रेस पहनना अनिवार्य होगा। इस ड्रेस कोड का पालन किये बिना किसी भी कर्मचारी को कार्यालय में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। और यदि कोई अफ़ग़ानी मर्द इस आदेश की अवहेलना करता पाया जायेगा तो उसे सज़ा भी दी जायेगी।

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धार्मिक आराधना को लेकर भी तालिबान ने सख़्त फ़रमान जारी किये हैं। जिसके मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान में लोगों को निर्धारित समय पर पांचों वक़्त की नमाज़ अदा करनी ही होगी। नियमित रूप से नमाज़ अदा न करने वाले कर्मचारियों को भी कार्यालयों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं होगी। यहाँ तक कि इन नियमों का पालन न करने वालों को नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता है।

अभी कुछ दिनों पहले ही तालिबानों ने लड़कियों की हाई स्कूल के आगे की पढ़ाई करने पर भी रोक लगा दी थी। हिजाब में रहना भी अफ़ग़ानी महिलाओं के लिये अनिवार्य होगा। पर्देदार महिलाओं को ही शिक्षा व रोज़गार का अवसर दिया जायेगा। इन्हीं तालिबानों ने अपने शासन के 1996 और 2001 के मध्य के पहले दौर में लड़कियों के शिक्षा हासिल करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। यह वही दौर था जब मलाला यूसुफ़ ज़ई अफ़ग़ानी लड़कियों को शिक्षित करने के लिये कोशिश कर रही थीं जिससे चिढ़ कर इन शिक्षा विरोधी जाहिल तालिबानों ने उसपर जानलेवा हमला किया था। 

मलाला को उसकी लड़कियों की शिक्षा के प्रचार प्रसार की इन्हीं कोशिशों के लिये नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था जबकि तालिबानों के नेतृत्व में अफ़ग़ानिस्तान की दुर्गति और उनके कट्टरपंथी विचार आज भी दुनिया के सामने हैं।

सवाल यह है कि धर्म की आड़ में शासकों का मुंह छुपाना कहीं देश की वास्तविक राजनैतिक, आर्थिक, औद्योगिक तथा शिक्षा, स्वास्थ्य  महंगाई  व विकास आदि के मोर्चे पर विफलता का परिणाम तो नहीं? यदि अफ़ग़ानिस्तान की ईरान से तुलना की जाये तो वह भी धर्म प्रधान देश है। परन्तु वहां इस तरह की न तो कोई धार्मिक अनिवार्यता है और न ही ऐसे क़ानूनों की अवहेलना करने वालों पर कोड़े मारने या सज़ा का प्रावधान। नतीजतन तमाम अमेरिकी प्रतिबंधों व अमेरिकी इज़राईली व अरब देशों की साज़िशों के बावजूद उद्योग, विज्ञान, सैन्य, शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में न केवल ईरान आत्मनिर्भर है बल्कि तमाम वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद तरक़्क़ी के नये मापदंड स्थापित कर रहा है। 

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ऐसा प्रतीत होता है कि अफ़ग़ानिस्तान की ही तरह जो भी देश अपने वास्तविक हालात से मुंह छिपाना चाहते हैं। जो महंगाई, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सबसे महत्वपूर्ण जन सरोकारी क्षेत्रों में पूरी तरह असफल हैं वही देश धर्म, धार्मिक रीति रिवाजों, प्राचीन दक़ियानूसी सोच व परम्पराओं की आड़ में पनाह लेने की कोशिश करते हैं। और धर्मान्धता की ये कोशिशें ऐसे किसी भी देश को कहाँ ले जा सकती हैं यह समझने के लिये अफ़ग़ानिस्तान से बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है।
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तनवीर जाफ़री
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